गुरुवार, 25 फ़रवरी 2010

विश्व में सूचनाधिकार का इतिहास

शासकीय कामकाज में पारदर्शिता और सूचनाधिकार के लिए दुनिया भर में विभिन्न रूपों में मांग उठती रही है। लेकिन स्वीडेन पहला देश है, जिसने 243 साल पहले सूचनाधिकार लागू किया था। वहां 1766 में फ्रीडम ऑफ प्रेस एक्ट पारित हुआ। इसमें लोक-दस्तावेजों तक पहुंच का अधिकार दिया गया था। इसे सुविचारित रूप से फ्रीडम ऑफ द प्रेस एक्ट, 1949 में प्रतिस्थापित किया गया। फिर 1976 में संशोधन भी हुआ। स्वीडेन के संविधान में हर नागरिक को, कुछ विषयों में निर्बंधन को छोड़कर सभी सरकारी दस्तावेज हासिल करने का अधिकार है। वहां सभी प्रशासनिक दस्तावेजों को खुला मान लिया जाता है। सबसे पहले पारदर्शिता लागू करने वाले देश स्वीडेन की प्रति व्यक्ति आय आज दुनिया में सर्वाधिक है।


स्वीडेन में सूचनाधिकार लागू होने का प्रसंग काफी रोचक है। स्वीडेन में दो मुख्य पार्टियां थीं। एक थी- हैट्‌स, दूसरी थी- कैप्स। दोनों का अर्थ है- टोपी। विपक्षी पार्टी ‘कैप्स’ उदारवादी थी। वह विपक्ष में थी और पारदर्शिता की मांग करती थी। दूसरी ओर, लंबे समय से सत्ता पर काबिज ‘हैट्‌स’ ने गोपनीयता की वकालत की। 1765 में स्वीडेन में आम चुनावों में पारदर्शिता बनाम गोपनीयता का मुद्दा प्रमुख बना। चुनाव में ‘कैप्स’ की जीत हुई। अगले ही साल उसने अपने वायदे के मुताबिक पारदर्शिता का कानून लागू किया।


शासकीय कार्यों में पारदर्शिता एवं नागरिकों को जानने के अधिकार को लगभग 1940 के दशक में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण जरूरत मान लिया गया था। 1946 में संयुक्त राष्ट्रसंघ की आमसभा ने अपने प्रस्ताव में कहा था कि सूचना का अधिकार मनुष्य का एक बुनियादी अधिकार है तथा यह उन सभी स्वतंत्रताओं की कसौटी है, जिन्हें संयुक्त राष्ट्रसंघ ने प्रतिष्ठित किया है।

इसी तरह, संयुक्त राष्ट्रसंघ ने 1948 में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में घोषणा की- ‘जानकारी पाने की इच्छा रखना, उसे प्राप्त करना तथा किसी माध्यम द्वारा जानकारी एवं विचारों को फैलाना मनुष्य का मौलिक अधिकार है।’


फिनलैंड में 1951 में सरकारी दस्तावेजों की सार्वजनिक प्रकृत्ति निर्धारित करने संबंधी कानून के रूप में पारदर्शिता लागू की गयी। कनाडा, अमेरिका, फ्रांस, न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया जैसे देशों ने संयुक्त राष्ट्रसंघ की भावनाओं के अनुरूप सूचना के अधिकार संबंधी कानून बनाये। हालांकि, इनमें कई प्रकार के निर्बंधना व अपवाद भी रखे गये। इसके बावजूद पूरी दुनिया में सूचना के अधिकार की लहर चल पड़ी। ब्रिटेन ने अपने सौ वर्ष पुराने गोपनीयता कानून में संशोधन किया।


कनाडा में ‘एक्सेस टू इनफॉरमेशन एक्ट, 1982’ के जरिये सूचनाधिकार लागू हुआ। इसमें कनाडा के नागरिकों तथा स्थायी नागरिकों को सरकारी दस्तावेजों की सूचना हासिल करने का अधिकार दिया गया। इसके दायरे में विधि न्यायालयों, पार्लियामेंट एवं वाणिज्यिक निगमों को छोड़कर संघीय सरकार की सभी संस्थाओं को लाया गया।


अमेरिका ने प्रशासनिक प्रणाली अधिनियम, 1946 की धारा तीन के संशोधन के रूप में सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम, 1966 लागू किया। इस ‘फ्रीडम ऑफ इनफॉरमेशन एक्ट’ ने पारदर्शिता का जबरदस्त माहौल बनाया। इस कानून में संघीय सरकार के दस्तावेजों तक नागरिकों की पहुंच को ‘सामान्य’ बात बना दिया तथा उनमें गोपनीयता सिर्फ ‘अपवाद’ स्वरूप ही रह गयी। इस अधिनियम के अनुसार सिर्फ नौ अपवादों के आधार पर ही नागरिकों को किसी सूचना से वंचित किया जा सकता है। अमेरिका के सूचना स्वातंत्र्य अधिनियम 1974 के तहत सूचना देने का दायित्व शासन पर है।


फ्रांस में सरकारी दस्तावेजों तक नागरिकों की पहुंच सुनिश्चित करने हेतु 1978 में कानून बना। इसमें आठ अपवादों के आधार पर किसी नागरिक को किसी सूचना से वंचित करने का प्रावधान रखा गया।


आस्ट्रेलिया में ‘फ्रीडम ऑफ इनफॉरमेशन एक्ट, 1982’ के रूप में सूचनाधिकार लागू हुआ। इसके दायरे में संघीय सरकार की सभी एजेंसियों को लाया गया जिसमें राजधानी प्रक्षेत्र भी शामिल था। इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया- “इस अधिनियम द्वारा ऐसी जानकारी पाने का अधिकार दिया जाता है, जो मंत्रियों, विभागों और लोक-प्राधिकारियों के कब्जे में दस्तावेजों के रूप में है। इसमें अपवाद के बतौर सिर्फ अत्यावश्यक लोकहित और निजी मामले आयेंगे।


न्यूजीलैंड ने ‘ऑफिशियल इनफॉरमेशन एक्ट, 1982’ बनाया। इस कानून की एक विशेषता यह है कि इसमें सिर्फ सरकारी दस्तावेजों को ही ‘सूचना’ नहीं माना गया बल्कि किसी मंत्री या अधिकारी के पास शासकीय हैसियत से मौजूद किसी तथ्य के ज्ञान या परिस्थिति की जानकारी को भी ‘सूचना’ के दायरे में रखा गया है। इस कानून में अपवादों की सूची नहीं दी गयी है बल्कि इसका निर्धारण करने का काम ‘ऑम्बुड्‌समैन’ तथा न्यायालयों पर छोड़ दिया गया है। इसमें सूचना से इंकार किये जाने पर ‘ऑम्बुड्‌समैन’ के पास अपील का प्रावधान है। हालांकि ‘ऑम्बुड्‌समैन’ के फैसले पर मंत्री को वीटो लगाकर उस सूचना को देने से इंकार करने का अधिकार है। यह ‘ऑम्बुड्समैन’ के अधिकार को सीमित करता है।


संयुक्त राष्ट्रसंघ के पूर्व महासचिव कोफी अन्नान ने सूचना की ताकत को इन शब्दों में अभिव्यक्त किया था- ’’सूचना की व्यापक लोकतंत्रकारी श्क्ति से हमें परिवर्तन और निर्ध्नाता उन्मूलन के समस्त अवसर इतने रूपों में मिले हैं, जिनकी हम आज कल्पना तक नहीं कर सकते।’’

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